This blogpost is my first one in Hindi. 
दूरियां तो हमने बनाईं
दीवारे भी हमने बनाईं

पीठ हमने मोड़ी

और टुकड़े भी हमने किये

ऐक होने का अहसास हम भूलते चले गए

साथ खुशियां मनाना भी भूल गए

रंगों को भी बांट दिये

कपड़े भी अलग कर ही दिये
अब बातें होती हैं अरबि अच्छी या संसकृत

शमशान बनाए या कबृस्थान

बिरयानी खाएं या पुलाव

बहस होती है मीठी सेवईयां ज्यादा या खीर 
बचपन से बच्चों को सिखाया 

कहा दुनिया में एक हम हैं अौर बाकी वो लोग हैं

बच्चे बड़े हुए तो नफरतें भी बड़ीं

अौर ख़ून भी बहा
ख़ुद गुनहगार होकर भी दोष ऊूपर देख कर ही देते हैं

सब दिखता है आज बस अपने ही गिरेबान में झांकने से कतराते हैं
सुना था कुछ 3.8 अरब साल लगे यहां तक अाने में

शायद यह वक्त भी कम पड़ा हमें इनसान बनने में। 

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